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डॉ. अशोक शर्मा

 डॉ. अशोक शर्मा ने पं. बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान की स्थापना २००५ में अपने स्वर्गीय पिता पं. बैजनाथ शर्मा की याद में की थी |

डॉ. अशोक शर्मा अपने समय के एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व थे | वे अपने पूर्वजों की परंपरा के नायक और वाहक रहे | उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों से सनातन धर्म, विज्ञान और दर्शन को तार्किक रूप से अपने देश और विदेशों में प्रचारित किया, उनके विचार वेदों, श्रुतियों और अन्यान्य दर्शन ग्रंथों से अनुप्राणित थे |

डॉ. शर्मा का जन्म ९ अक्टूबर १९४७ को हाथरस में श्री बैजनाथ शर्मा जी के घर में हुआ था जो कि उस समय के जाने माने ज्योतिषी, आविष्कारक और होमियोपैथ थे | उनकी परवरिश ऐसे घर में हुई जहां घर की बैठक हमेशा विद्वानों, पंडितों और गणमान्य लोगों से भरी रहती थी अतः बचपन से ही पढ़ने, समझने और तर्क करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति उन में विकसित हुई | कविता लिखना, समस्या पूर्ती व वाद-विवाद प्रतियोगिता उनके लिए हमेशा से ही रुचिकर रहीं | बाल्यकाल से ही उन्हें संस्कृत, ज्योतिष और कर्म-काण्ड में प्रशिक्षित किया गया और बाद के जीवन में उनकी सोच पर इन सभी का गहरा प्रभाव रहा |

स्कूल के समय में वे हॉकी के खिलाड़ी रहे और पी. सी. बागला कॉलेज में छात्र संघ के पहले अध्यक्ष रहे जहां से वे हिंदी में बी. ए. कर रहे थे | इसके उपरांत वे उच्चतर शिक्षा के लिए इलाहाबाद आये जहाँ उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९७१ में हिंदी में एम. ए. किया तदोपरांत “स्वातन्त्रोयत्तर हिंदी कविता में लोक जीवन” विषय में एम. फिल. १९७७ में पूर्ण किया | इलाहाबाद में कॉलेज के समय में वे कई साहित्यकारों के संपर्क में रहे और कविता और साहित्य के प्रति विशेष लगाव इसी समय में पैदा हुआ | उस समय इलाहाबाद हिंदी साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था, डॉ. शर्मा नयी कविता से प्रभावित हुए और स्वयं कविता करने लगे | इस समय में उन्होंने कई कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया जहाँ उन्हें महान हिंदी कवि कवियित्री जैसे महादेवी वर्मा, निराला, सुमित्रानंदन पन्त का सान्निध्य मिला | सुमित्रा नंदन पन्त जी ने उनके एक काव्य संग्रह “मन सम्पाती” की भूमिका भी लिखी थी | इसी समय में लिखी उनकी रचनायें कई पत्र पत्रिकाओं जैसे धर्मयुग, कादम्बिनी आदि में प्रकाशित हुईं और बाद के वर्षों में स्वतंत्र काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित हुईं | आल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद, मथुरा और आगरा से भी उनकी कई रचनाये और वार्ताएं प्रसारित हुईं | डॉ. शर्मा की कविताओं में गंभीर चेतना, भावना और दृढ आशा के साथ महती सकारात्मक सोच दिखाई देती है |

जीवन भर उनमें पढ़ने और तार्किक रूप से किसी भी विषय पर मंथन करने की अद्भुत व विलक्षण प्रतिभा थी | उनके मित्र बताते हैं की “सूर सागर” उन्होंने एक ही बैठक में सम्पूर्ण पढ़ा था और सेकड़ों पद उन्हें मुंह जुबानी याद थे | हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान पर अधिकार होने के साथ साथ गणित में भी उनको विशेष योग्यता थी, जन्मपत्रिका बनाते समय वे बिना कैलकुलेटर प्रयोग किये सभी गणनाएं दिमाग में ही कर लेते थे |

वे कॉलेज के बाद कुछ समय आल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद में कार्यरत रहे परन्तु विवाह के बाद अलीगढ में धर्म समाज कॉलेज के हिंदी विभाग में प्रवक्ता पद पर रहे तथा यहीं से वे २००९ में सहायक प्रोफ़ेसर पद से सेवा निवृत्त हुए | उनका विवाह श्रीमती आशा शर्मा से हुआ जिनके पिता अपराध शाखा में डी.एस.पी. श्री हरी शंकर शर्मा थे |

डॉ. शर्मा ने ज्योतिष और हिंदी के ज्ञान से प्रसिद्धि और सामाजिक यश प्राप्त किया | उनका परिवार ज्योतिष और पांडित्य के लिए जाना जाता रहा है अतः कॉलेज में प्रवक्ता होने के साथ साथ वे ज्योतिष और पांडित्य का कार्य भी करते रहे | वे “Astrological Research Projects” और “विश्व ज्योतिष विद्यापीठ , कोलकाता” के सदस्य रहे | वे श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भागवतगीता के भी अच्छे वक्ता थे और आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इनका ज्ञान देश और विदेश में प्रचारित करते रहे |

हिंदी के प्राध्यापक और विद्वान होने से डॉ. शर्मा ने हिंदी और संस्कृत पर कई पाठ्य पुस्तकें लिखीं जो अभी भी कई CBSE माध्यम के विद्यालयों में पढाई जाती हैं | वे रीडर रहते हुए कई विश्वविद्यालयों और संस्थाओं में संगोष्ठियों और व्याख्यानों में आमंत्रित किये जाते रहे और इसी श्रंखला में वे आगरा विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, जीवन बीमा निगम, रेलवे बोर्ड और भारतीय खाद्य निगम जैसे संस्थानों में समय समय पर व्याख्यान देते रहे | उनके सफल निर्देशन में बीस से अधिक छात्रों ने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है |

डॉ. शर्मा का साहित्यिक लेखन भी प्रकाशित जिन में “सांकलें टूटी पड़ी हैं“, “जवाहर ज्योति”, “अनंग”, “मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा”, “मन सम्पाती” और “दधीची” प्रमुख हैं |

डॉ. शर्मा ने विश्व के कई देशों का भ्रमण किया और हिंदी, संस्कृत, सनातन धर्म, सनातन दर्शन और वेद-वेदांगों पर समीचीन व्याख्यान व विचार सभी जगह प्रचारित किये | विदेशों में रह रहे भारतीय बन्धु उन्हें प्रति वर्ष कनाडा और अमेरिका बुलाते थे और वे कई बार इसी क्रम में न्यूसीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फिजी अदि देश भी घूमे | उनके व्याख्यान और साक्षात्कार कनाडा के रेडियो झिलमिल पर भी प्रसारित हुए |

डॉ. शर्मा को कई संस्थाओं ने उनके प्रकांड अध्ययन और भारतीय मनीषा के विचारों हेतु सम्मानित किया, इन में से कुछ हैं –

-         गीता ज्ञान सोसाइटी, ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा

-         सनातन धर्म रामायण मंडली ऑफ़ फ़िजी

-         वैदिक हिन्दू सोसाइटी ऑफ़ सरी

-         संगम एजुकेशनल एंड कल्चरल सोसाइटी, रिचमंड, कनाडा

-         सनातन धर्म सभा, हाथरस

-         श्याम धारा, हाथरस

-         अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा, हाथरस

समाज में उनके स्थान के लिए उन्हें दो बार “सनातन धर्म सभा, हाथरस” का अध्यक्ष चुना गया | हाथरस की १०१ संस्थाओं ने उनके कार्य के लिए उन्हें सम्मानित किया था |

डॉ. शर्मा चमत्कारी व्यक्तिव्य के धनी थे और प्रथम भेंट में ही किसी व्यक्ति पर अपना प्रभाव छोड़ने में सक्षम थे | वे ज्योतिष पर परामर्श देते थे और ज्योतिष में उन्होंने कई छात्रों को शिक्षित किया था |

इस सब के अतिरिक्त डॉ. शर्मा प्राचीन भारतीय विज्ञान पर भी शोध कर रहे थे, उन्होंने भारतीय ज्योतिष, खगोलशास्त्र और गणित पर क्रांतिकारी अध्ययन किया और सिद्ध किया कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में अपार वैज्ञानिक ज्ञान संहिताबद्ध है | आगरा विश्वविद्यालय में उन्होंने एक शोध पत्र “The Measurement System in Ancient India” पर प्रस्तुत किया था जो की विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ था | डॉ. शर्मा ने अपने पिता की याद में “पं. बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान” की स्थापना की थी | इस संस्थान का उद्देश्य प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में विदित विज्ञान पर शोध करना है और संस्थान एक त्रैमासिक पत्रिका “प्राच्य मंजूषा” का प्रकाशन करता है | डॉ. शर्मा के कुशल निर्देशन में संस्थान ने आयुर्वेद, ज्योतिष, काव्य आदि पर कई बड़े और सफल आयोजन किये हैं जिन में भारत के नामचीन विद्वानों ने भाग लिया है |

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भारतीय गणित, खगोल और ज्योतिष पर अपने कार्य को उन्होंने पुस्तकरूप दे दिया था और पांडुलिपि रूप में यह सुरक्षित है | संस्थान इस पुस्तक को प्रकाशित करने की व्यवस्था कर रहा है जो भारतीय चिंतन के वैज्ञानिक पक्ष को विश्व के समक्ष रख सकेगी |

डॉ. शर्मा का देहावसान ३० सितम्बर, २०१२ को अलीगढ़ में हुआ जब वे ज्योतिष पर एक समारोह को संबोधित कर रहे थे | उन के निधन से समाज, संस्थान और भारतीय चिंतन में अपार श्रद्धा रखने वाले एक महान व्यक्तित्व का अवसान हुआ है जिसकी क्षतिपूर्ति निकट भविष्य में अति दुष्कर है |

संगोष्ठियों में एवं प्रकाशित शोध निबंध –

  • A world of difference between Indian and western Astrology (Published in “Shared Vision” Issue 48, August 1992, Vancouver, Canada)
  • ब्रज लोकगीतों में जातीय समरसता (२३ जनवरी १९९५, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झाबुआ, म.प्र.)
  • मानवीय मूल्य और कविता (७-८ मार्च, १९९७, अम्बाह स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अम्बाह, मुरैना, म.प्र.)
  • प्राचीन भारत में समय, दूरी एवं कोण मापन के मूल मात्रक (२०-२२ फ़रवरी १९९९, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा)
  • मालिक मुहम्मद जायसी की वर्तमान सन्दर्भों में प्रासंगिकता (शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, झाबुआ, म.प्र.)
  • सूर्य के विशेष सन्दर्भ में खगोलीय आयामों के लिए परस्पर परिवर्तनीय मात्रक (२८-३० मार्च, २००५, पं. बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान, हाथरस)
विदेशों में –
  • Hindi, It’s origin and relationship with Sanskrit and other Indian languages
  • Importance of knowing Mother tongue and the future of a multilingual India (August 2004, Richmond, Canada)
  • Direction for Hindi curriculum development program (South Asian multilingual Society, Vancouver, Canada)/li>
  • What governs life – A series of 5 lectures (Manav Sewa Society, Vancouver, Canada)
  • प्राचीन भारतीय विद्याएँ - ज्योतिष
  • प्राचीन भारतीय विद्याएँ - गणित
  • प्राचीन भारतीय विद्याएँ - व्याकरण
  • प्राचीन भारतीय विद्याएँ - आयुर्वेद
  • प्राचीन भारतीय विद्याएँ - निरुक्त
  • पुराणों की परिभाषा श्रीमद्भागवतगीता के विशेष सन्दर्भ में (श्री सनातन धर्म रामायण मण्डली ऑफ़ फ़िजी, वैंकोवर, कनाडा)
  • रामचरित मानस के सन्दर्भ में कर्म का स्वरुप (१९९९, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया)