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भारत के अतीत के गौरव में छिपे वैज्ञानिक ज्ञान के रहस्य न केवल भारत, बल्कि विदेशों से भी चिंतनशील मानस को आकर्षित करते रहे ह । इस दार्शनिक अवलोकन की वैज्ञानिक वैधता के बारे में दो राय नहीं हो सकती कि अतीत, वर्तमान को अपनी सत्ता बता कर नहीं बल्कि हमेशा बढने वाले वर्तमान की प्रकृति व गुणों के नवीकरण से वर्तमान को संशोधित करता है । लेकिन यह बेहद निराशाजनक है कि एक देशज का अपने राष्ट्र के प्राचीन अतीत के गौरव का दृष्टिकोण अक्सर भावनात्मक है , वह न तर्कसंगत है, और न वैज्ञानिक, कम से कम उन के लिये जो तर्कसंगत व वैज्ञानिक तरीकों से शोध के लिये प्रशिक्षित हैं ।

हमारी प्रवृत्ति, भारत में, हमारे दूर के प्राचीन गौरव को एक अर्ध वैज्ञानिक और एक अर्द्धपारदर्शी प्रशंसा के माध्यम से देखने की है । यही बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों को पुरातन भारतीय ग्रंथों में सिद्धांतों और वैज्ञानिक मतों की खोज के लिये आकर्षित करता है, जो अभी या तो आने हैं या प्रस्तुति के बीच में हैं । भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान और सोच के विकास के इतिहास में, प्राचीन भारतीय संस्कृत में लिखित पुस्तकों के अध्ययन के गंभीर और अर्धगंभीर प्रयासों के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं । इन गंभीर और अर्धगंभीर पढ़ाई के परिणाम या तो उन प्राचीन खोजों और अनुसंधान जो हद स्तर का था, की भावनात्मक सराहना थी या फ़िर एक सिरे से उन की अस्वीकृति थी । वास्तव में, प्राचीन भारत में वैज्ञानिक खोजों और अनुसंधान का स्तर की एक पूरी तरह तर्कहीन अस्वीकृति या एक पूरी तरह से भावनात्मक सराहना अधूरा और पक्षपातपूर्ण है.।